गावो विश्वस्य मातरः

 


गुजरात के तापी जिले की एक अदालत ने कहा कि जिस दिन पृथ्वी पर गाय का एक भी बूंद खून नहीं गिरेगा, उसी दिन धरती की समस्याएँ समाप्त हो जाएंगी।

               अदालत ने महाराष्ट्र से गो तस्करी के दोषी युवक आरिफ अंजुम को आजीवन कारावास और पांच लाख रूपये जुर्माने की सजा सुनाते यह टिप्पणी की। सत्र न्यायाधीश एसवी व्यास ने आदेश में कहा कि धर्म गाय से पैदा होता हैं, क्योंकि धर्म वृषभ के रूप में होता हैं और गाय के पुत्र को वृषभ कहा जाता हैं। अदालत ने संस्कृत के एक श्लोक को भी उद्धृत किया, जिसमें कहा था कि अगर गाय विलुप्त हो जाती है, तो ब्रह्यांड का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। वेद के छः अंगों की उत्पति गायों के कारण हुई। गुजराती भाषा में 24 पेज के आदेश में कोर्ट ने कहा कि गोहत्या, तस्करी की घटनाएं सभ्य समाज के लिए शर्मनाक हैं। कोर्ट ने दो श्लोकों का उल्लेख किया, जिसमें कहा है कि जहाँ गायें सुखी रहती हैं, वहां समस्त धन-संपति की प्राप्ति होती हैं। गायें दुखी रहती हैं, तो सब नष्ट हो जाता हैं।

               माननीय कोर्ट का यह फैसला सराहनीय हैं। भारत एक कृषि प्रधान देश हैं। भारत की खेती गौ प्रधान हैं। यदि गाय नहीं बचेगी तो खेती भी नहीं बचेगी। खेती नहीं बचेगी तो अन्न, फल, फूल, सब्जी आदि भी उपलब्ध नहीं होगी। अतः गाय और कृषि का जोड़ा हैं। जिसने भी इनको अलग-अलग किया हैं। वे सभी घाटे में ही रहे। गाय से ही दूध, दही, घी, मक्खन, छाछ मिलता हैं। जो हमारे परिवार को स्वस्थ रखता हैं।

               गौ-पालन आदिकाल से होता रहा हैं। जिसके पास जितना गौ वंश होता था, वह उतना ही धनी व्यक्ति कहलाता था। प्राचीन काल में राजा-महाराजा, नगर सेठ, सामन्त और ठाकुर लोग अपने पास गायों की झुंड रखते थे। बैल के द्वारा ही सारी खेती और खेती के अन्य कार्य किये जाते थे। बछड़ों को हल जोतने, गाड़ी जोतने, कुएँ से पानी निकालने, तेल निकालने की घाणी चलाने आदि सभी काम का प्रशिक्षण दिया जाता था। माल ढ़ोने का काम भी बंजारा लोग बैलों से ही करते थे। इस प्रकार गाय का धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक महत्व था। आधुनिक काल में खेती का मशीनीकरण हो गया हैं। खेती और गौ पालन अलग-अलग लोग करने लगे। अतः दोनों लोग अपने-अपने कार्य से दुखी हैं, और नुकसान उठा रहे हैं। यदि दोनों को एक कर दिया जाए तो फिर भारत सोने की चिड़िया हो जायेगा।

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